‘साधना द्वारा आत्म तेज जागृत करना’, यही सच्चा सशक्तिकरण है !

वैन (संदीप मुंजाल, महिला शाखा, हिंदू जनजागृति समिति, दिल्ली - 08.03.2026) :: पिछले कुछ वर्षों से स्त्री-मुक्ति या महिला सशक्तिकरण, ये विषय चर्चा में हैं। ‘महिलाओं का सशक्तिकरण’ यह विषय अधिकांश समय आधुनिकीकरण अथवा पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति-विरोधी विचारधारा के प्रभाव से चर्चा में आता है। ‘अमर्यादित स्वतंत्रता ही मुक्ति है’ ऐसी अयोग्य संकल्पना तथाकथित प्रगतिशील और संस्कृति-विरोधियों द्वारा प्रसारित करने के प्रयास किए जाने के कारण आज अनेक महिलाएं, युवतियां अयोग्य मार्ग पर चल रही हैं। उन्हें वास्तविक उन्नति के मार्ग पर लाना हो, तो अयोग्य संकल्पनाओं की धारणाओं को नष्ट कर उन्हें योग्य दिशा देनी होगी। यह दिशा संस्कृति का अनुसरण और धर्माचरण करने के संदर्भ में है; क्योंकि साधना करके प्राप्त होने वाला आत्मतेज ही व्यक्ति की व्यावहारिक और पारलौकिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

हिंदू धर्म में महिलाओं का स्थान - ‘भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर अनेक बंधन थे। हाल के समय में विशेषतः उन्हें शिक्षा मिलने के बाद महिलाओं को अनेक अधिकार प्राप्त हुए’, ऐसा अपप्रचार अनेक लोगों द्वारा किया जाता है; किंतु अध्ययन करने पर वास्तविकता भिन्न होना ध्यान में आता है। भारतीय संस्कृति या सनातन हिंदू धर्म ने किसी पर भी अन्याय करने की शिक्षा कभी भी नहीं दी, अपितु सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अथवा ‘सर्वेत्र सुखिनः सन्तु’ ऐसी प्रार्थना की है। मनुस्मृति में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’ अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहां देवता रमण करते हैं, ऐसा कहा गया है। हिंदू धर्म ने महिलाओं को कभी भी उपभोग की वस्तु नहीं माना। अपितु हिंदू धर्म ने स्त्री को आदिमाया शक्ति का रूप माना है। विवाह के पश्चात कोई भी पूजा पत्नी की सहभागिता के बिना पूर्ण नहीं होती। हिंदू धर्म में देवताओं के नाम भी लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधे-श्याम, गौरी-शंकर इस प्रकार के हैं। जहाँ स्त्रियों को पुरुषों से भी ऊंचा स्थान दिया गया है, वहां स्त्री-पुरुष समानता की बातें करना अर्थात स्त्रियों का अवमूल्यन करने जैसा है। महिलाओं के लिए एक दिन नहीं, अपितु प्रत्येक दिन ही हिंदू धर्म ने दिया है। देवताओं के नाम उच्चारण करते समय भी पहले देवियों को वंदन करने वाला धर्म, अन्यायकारक है, ऐसा कहना ही हिंदू-द्वेष है, यह ध्यान में रखना चाहिए।

विद्वान, शूर और कर्तव्यनिष्ठ महिलाएं - भारतीय संस्कृति में अनेक विद्वान, पराक्रमी, कुशल महिलाओं के नाम सुने जाते हैं । महाभारत युद्ध में कश्मीर के राजा के मारे जाने के बाद उसकी पत्नी यशोमती का राज्याभिषेक स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने किया था। अर्जुन की एक पत्नी चित्रांगदा मणिपुर राज्य की रानी थी। श्री राम वनवास गमन पर, राजगुरु वसिष्ठ ऋषि ने राज्याभिषेक हेतु सीता जी के नाम हेतु सुझाव दिया था; किंतु सीताजी ने श्रीराम के साथ वनवास में जाने की अनुमति मांगी, इसलिए उसने राज्यकारभार नहीं दिया गया, ऐसा उल्लेख वाल्मीकि रामायण में है।

तात्पर्य हिंदू धर्म ने कभी भी स्त्री को कर्तृत्व से नहीं रोका है। पुराणों में अनेक विदूषियों के उल्लेख मिलते हैं। गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा आदि विदुषियां वेद-शास्त्र में पारंगत थीं। माता कैकेयी का आचरण कैसा भी रहा हो, किंतु दशरथ राजा के साथ कैकेयी भी युद्ध में शस्त्र हाथ में लेकर लड़ाई कर रही थी, ऐसा वर्णन है। हाल के समय का उदाहरण देखना हो, तो रानी लक्ष्मीबाई युद्ध शास्त्र में पारंगत थीं। देश प्रेम से ओतप्रोत होने के कारण ही छोटे से बालक को पीठ पर बांधकर वे युद्ध लड़ने गईं। शहाजीराजे के कर्नाटक में रहते समय राजमाता जिजाऊ ने पुणे में जहांगीर का राज्यकारभार संभाला। छत्रपति राजाराम की पत्नी रानी ताराबाई ने कर्तृत्व दिखाकर कोल्हापुर संस्थान की स्थापना की थी। अहिल्याबाई होलकर पति के निधन के बाद होलकर घराने की बागडोर संभाली । संक्षेप में शूर-वीर, विद्वान महिलाओं की परंपरा भारत को प्राप्त हुई है।

इस परंपरा के पथिक बनना हो, तो अपने भीतर के गुणों का विकास करके त्रुटियों और हीन भावना पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। ‘छोटे या पाश्चात्य कपड़े ही आधुनिकता हैं’, ‘अंग्रेज़ी बोलना ही प्रगतिशीलता है’ ऐसी अंधश्रद्धा त्याग देनी चाहिए। स्वच्छंदता जैसी बातों का त्याग करना चाहिए। स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में भेद है। उसे समझना चाहिए। परिवार व्यवस्था भारत की शक्ति है। स्त्री परिवार व्यवस्था की रीढ़ है। यह रीढ़ जितनी मजबूत होगी, उतनी ही परिवार व्यवस्था सुदृढ़ रहेगी। सांस्कृतिक मूल्यों का संवर्धन महिलाओं ने अधिक मात्रा में किया है। आज विश्व भर के लोग भी ‘बैक टू मदरहुड’ कहते हुए परिवार व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। हमें भी शालीनता और सुसंस्कृतता को बनाए रखने के संस्कार करने चाहिए।

असुरक्षित महिला - आज देश की परिस्थिति का विचार करें, तो महिलाएं असुरक्षित हैं। जिस देश में एक महिला के शील रक्षण के विषय पर रामायण, महाभारत घटित हुए, उसी देश में आज प्रतिदिन सैकड़ों महिलाएं अत्याचार की शिकार हो रही हैं। ‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो’ के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 में भारत में महिलाओं पर हिंसाचार के संदर्भ में 4.05 लाख घटनाओं की प्रविष्टि हुई। इनमें से 30 प्रतिशत घटनाएं घरेलू हिंसाचार की हैं, जबकि 8 प्रतिशत घटनाएं बलात्कार की हैं। ‘ऑक्सफेम’ इस वैश्विक विश्लेषण संस्था ने भारत में प्रत्येक 15 मिनट में एक लड़की के साथ बलात्कार होने की बात कही है। देश में वर्ष 2018 में बलात्कार की 34 हजार घटनाओं की प्रविष्टि हुई। 85 प्रतिशत प्रकरणों में आरोप निश्चित हुए; किंतु दंड केवल 27 प्रतिशत लोगों को ही हो सकी, ऐसा इस रिपोर्ट में कहा गया है। धर्मशिक्षण के अभाव में अनेक हिंदू युवतियां आज ‘लव जिहाद’ की शिकार हो रही हैं।

रामराज्य में महिलाएं मध्यरात्रि में आभूषण पहनकर अकेली घर से बाहर जा सकती थीं। आज ऐसी स्थिति नहीं है; क्योंकि आज रामराज्य नहीं है। छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में भी महिलाओं की ओर टेढ़ी दृष्टि से देखने वाले को हाथ-पाव काट दिए जाने का दंड मिला था । आज तुरंत दंड देना तो दूर; अपितु पीड़ित महिला की शिकायत भी सहजता से दर्ज नहीं की जाती, यह वास्तविकता है। केवल कठोर कानून बनाकर यह स्थिति नहीं बदलेगी, अपितु इसके लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास करने होंगे।

शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सक्षमता : महिलाओं को वास्तविक अर्थ में सक्षम बनाना हो, तो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऐसे 3 स्तरों पर उपाय करने होंगे। प्रसिद्धि प्राप्ति के लिए मंदिर की परम्परा तोडकर गर्भगृह में घुसने से महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होता, यह ध्यान में रखना चाहिए। महिलाओं को शारीरिक स्तर पर सक्षम बनाने के लिए उन्हें स्वसंरक्षण प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर इसके लिए प्रयास हो सकते हैं; किंतु केवल शारीरिक सक्षमता पर्याप्त नहीं है। परिस्थितियों का सामना करने का मनोबल और आत्मबल भी आवश्यक होता है। यह बल साधना और धर्माचरण के माध्यम से ही प्राप्त हो सकता है। आज अनेक महिलाएं, यहां तक कि विवाहित महिलाए भी माथे पर लाल गोल कुमकुम लगाने में लज्जा महसूस करती हैं। आधुनिकता के नाम पर पारंपरिक भारतीय परिधान छोड़कर छोटे कपड़े पहनती हैं। इस प्रकार उच्छृंखल आचरण से मनोबल और आत्मबल प्राप्त नहीं होगा, अपितु यह बल प्राप्त करने के लिए साधना ही करनी होगी। भक्ति और साधना के बल के कारण ही संत मीराबाई पर प्राणघातक संकट आने पर भी श्रीकृष्ण ने उनका अद्भुत रूप से रक्षण किया। भक्ति में ही शक्ति है, यह ध्यान में रखकर अपनी भाव भक्ति बढ़ानी चाहिए। ‘साधना द्वारा आत्म तेज जागृत करना’, यही सच्चा सशक्तिकरण है, यह ध्यान में रखना चाहिए। राजमाता जीजामाता, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, देवी अहिल्याबाई होलकर, रानी चेनम्मा जैसी वीरांगनाओं के आदर्शों पर चलना ही सशक्तिकरण है।

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