नवसंवत्सरारम्भ के दिन किए जाने वाले धार्मिक कृत्य!

वैन (कृतिका खत्री, सनातन संस्था, दिल्ली - 17.03.2026) :: कोई भी पर्व आता है, तो उस पर्व की विशेषता के अनुसार और अपनी परंपरा के अनुसार हम कुछ न कुछ करते ही हैं। किंतु धर्म में बताए गए ऐसे पारंपरिक कृत्यों के पीछे के अध्यात्मशास्त्र को समझ लिया जाए, तो उनका महत्त्व हमें स्पष्ट हो जाता है। नवसंवत्सरारम्भ के दिन किए जाने वाले धार्मिक कृत्यों की जानकारी सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख में जानें तथा वर्तमान काल में नवसंवत्सरारम्भ कैसे मनाया जाए, यह भी समझें।

अभ्यंगस्नान (मांगलिक स्नान) : नवसंवत्सरारम्भ के दिन प्रातःकाल शीघ्र उठकर सबसे पहले अभ्यंगस्नान करने के लिए कहा गया है। अभ्यंगस्नान करते समय देशकालकथन किया जाता है।

तोरण लगाना : स्नान के पश्चात आम्रपल्लवों के तोरण तैयार करके प्रत्येक द्वार पर लाल फूलों सहित बांधना चाहिए; क्योंकि लाल रंग शुभ का प्रतीक है।

पूजा : पहले नित्यकर्म देवपूजा करते हैं। ‘वर्षप्रतिपदा के दिन महाशांति करनी होती है अतः शांति के प्रारंभ में ब्रह्मदेव की पूजा करते हैं; क्योंकि इसी दिन ब्रह्मदेव ने विश्व की निर्मिती की। पूजा में उन्हें दवणा नामक सुगन्धित वनस्पति अर्पित करते हैं। इसके पश्चात होमहवन और ब्राह्मणसंतर्पण करते हैं। फिर अनंत रूपों में अवतीर्ण होने वाले विष्णु की पूजा करते हैं। ‘नमस्ते बहुरूपाय विष्णवे नमः ।’, यह मंत्र कहकर उन्हें नमस्कार करते हैं। इसके बाद ब्राह्मण को दक्षिणा देते हैं। संभव हो तो इतिहास, पुराण आदि ग्रंथ ब्राह्मण को दान देते हैं। यह शांति करने से सभी पापों का नाश होता है, आयु बढ़ती है और धन-धान्य की समृद्धि होती है, ऐसा कहा गया है।’ संवत्सर पूजा करने से सभी पापों का नाश होता है, आयुवृद्धि होती है, सौभाग्य में वृद्धि होती है और शांति प्राप्त होती है। इस दिन जो वार हो, उस वार के देवता की भी पूजा करते हैं।

ब्रह्मध्वज स्थापित करना : इस दिन विजय के प्रतीक के रूप में सूर्योदय के समय शास्त्रानुसार ब्रह्मध्वज स्थापित किया जाता है। ब्रह्मध्वज सूर्योदय के तुरंत बाद मुख्य द्वार के बाहर; परंतु चौखट के समीप (घर से देखने पर) दाहिनी ओर भूमि पर चौकी रखकर उस पर खड़ा करना चाहिए। ब्रह्मध्वज स्थापित करते समय उसकी स्थापना स्वस्तिक पर करके आगे की ओर थोड़ा झुकी हुई अवस्था में ऊँचाई पर खड़ी करनी चाहिए। सूर्यास्त के समय गुड़ को नैवेद्य दिखाकर ब्रह्मध्वज उतारना चाहिए।

दान : याचकों को अनेक प्रकार के दान देने चाहिए, जैसे उदकदान। इससे पितर संतुष्ट होते हैं। ‘धर्मदान’ को शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। वर्तमान समय में धर्मशिक्षण देना समय की आवश्यकता है।

पंचांगश्रवण : ज्योतिष का पूजन करके उससे अथवा ‘उपाध्याय’ से नववर्ष का पंचांग अर्थात् वर्षफल श्रवण करते हैं। इस पंचांगश्रवण का फल इस प्रकार बताया गया है –

तिथेश्‍च श्रीकरं प्रोक्तं वारादायुष्यवर्धनम् ।
नक्षत्राद्धरते पापं योगाद्रोगनिवारणम् ॥
करणाच्चिन्तितं कार्यं पञ्चाङ्गफलमुत्तमम् ।
एतेषां श्रवणान्नित्यं गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥

अर्थ :
तिथि के श्रवण से लक्ष्मी प्राप्त होती है, वार के श्रवण से आयु बढ़ती है, नक्षत्र श्रवण से पापों का नाश होता है, योग श्रवण से रोग दूर होते हैं और करण के श्रवण से मन में सोचा हुआ कार्य सिद्ध होता है। इस प्रकार पंचांगश्रवण का यह उत्तम फल है। इसका नित्य श्रवण करने से गंगास्नान का फल प्राप्त होता है।’

नीम का प्रसाद : पंचांग श्रवण के बाद नीम का प्रसाद वितरित किया जाता है। यह प्रसाद नीम की कोमल पत्तियां, जीरा, हींग, भिगोई हुई चने की दाल और शहद से बनाया जाता है।

भूमि (जमीन) जोतना : इस दिन भूमि में हल चलाना चाहिए। हल चलाने की क्रिया से नीचे की मिट्टी ऊपर आती है। मिट्टी के सूक्ष्म कणों पर प्रजापति लहरियों का संस्कार होकर बीज अंकुरित होने की भूमि की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। खेती के औजारों और बैलों पर प्रजापति लहरियां उत्पन्न करने वाले मंत्र के साथ अक्षता डालनी चाहिए। खेत में काम करने वाले लोगों को नए वस्त्र देने चाहिए। इस दिन खेत में काम करने वाले लोग और बैलों के भोजन में पका हुआ कद्दू, मूंग की दाल,चावल, पूरण आदि पदार्थ होने चाहिए।

सुखदायक कृत्य : विभिन्न प्रकार के मंगल गीत, वाद्य और पुण्य पुरुषों की कथाएं सुनते हुए यह दिन आनंदपूर्वक बिताना चाहिए। आजकल के समय में पर्व का अर्थ केवल मनोरंजन का दिन बन गया है; परंतु हिंदू धर्मशास्त्र के अनुसार पर्व का अर्थ ‘अधिकाधिक चैतन्य प्राप्त करने का दिन’ होता है। इसलिए पर्व के दिन सात्त्विक भोजन, सात्त्विक वस्त्र, तथा अन्य धार्मिक कृत्य आदि करने के साथ-साथ सात्त्विक सुखदायक कृत्य करने के लिए शास्त्रों में कहा गया है। पर्व, धार्मिक विधि के दिन और नवसंवत्सरारम्भ जैसे शुभ दिन पर नए या कौशेय (रेशमी) वस्त्र तथा आभूषण धारण करने से देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वस्त्रों में आकर्षित हुई देवताओं के तत्त्व तरंगें वस्त्रों में दीर्घकाल तक रहती हैं और ये वस्त्र वर्ष भर धारण करने वाले को देवताओं की तत्त्व तरंगों का पूरे वर्ष लाभ मिलता है।

नवसंवत्सरारम्भ के दिन की जाने वाली प्रार्थना : ‘हे ईश्वर, आज तुझसे प्राप्त होने वाले शुभ आशीर्वाद और ब्रह्मांड से आने वाली सात्त्विक तरंगें मुझे अधिकाधिक ग्रहण होने दीजिए। इन तरंगों को ग्रहण करने की मेरी क्षमता नहीं है। मैं पूर्णतः आपकी शरण आया हूं। आप ही मुझे इन सात्त्विक तरंगों को ग्रहण करना सिखाए’, यही आपके चरणों में प्रार्थना!

संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ ‘पर्व, धार्मिक उत्सव और व्रत’

Responses

Leave your comment